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बड़ेल में फ़ैज़ क़िदवई के आवास पर हुआ शानदार मुशायरा का आयोजन

  इरशाद खान

 बाराबंकी। शाद बड़ेलवी द्वारा फ़ैज़ किदवाई के आवास पर एक शानदार मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता मास्टर इरफान बाराबंकवी ने तथा संचालन वक़ार काशिफ़ ने किया। मुख्य अतिथि के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर रेहान अलवी तथा नफ़ीस बाराबंकवी उपस्थित रहे। इस अवसर पर शायरों ने एक से बढ़कर एक कलाम प्रस्तुत किए।

इरफ़ान बाराबंकवी ने पढ़ा - क़यामत से मुझको डराते हो क्यों कर, तेरा रूठना क्या क़यामत नहीं है,

डॉक्टर रेहान अलवी ने कहा- कुछ बुरा वक्त यूं भी निभाना पड़ा, फेकी चीजों को फिर से उठाना पड़ा,

 वक़ार काशिफ़ ने पढ़ा- ये जो पानी मेरी आंखों में भरा रहता है, इसलिए ज़ख़्म मोहब्बत का हरा रहता है,

नफ़ीस बाराबंकवी ने कहा- अपने क़दम सफ़र में कुछ ऐसे बढ़ाइए, चलना पड़े जो आग पर चलकर दिखाइए

ज़ैद मज़हर ने कहा- ख़ुलूस वालों को हरगिज़ ख़फ़ा नहीं करते, फिर ऐसे लोग दोबारा मिला नहीं करते,

शाद बड़ेलवी ने सुनाया जिस मौसम में चांद घटाओं से निकले, वो मौसम क्या ख़ूब सुहाना होता है,

ज़ाहिद  बाराबंकवी ने कहा-इब्ने आदम की ये फ़ितरत होती है, एक मिले तो दो की चाहत होती है,

दानियल साक़िब ने सुनाया- वो बार-बार चमकते हैं जब अंधेरा हो, ग़ुरूर रात का कुछ जुगनुओं ने तोड़ा है,

कैफ़ बड़ेलवी ने कहा-रास्ते ख़ामोश हैं अपनी जगह हम क्या करें,बीच में कश्ती हमारी दूर अब साहिल भी है,

तालिब आलापुरी ने सुनाया - सजदा वो है जिस में पाया जाए ख़ुलूस, सिर्फ़ जबीं झुक जाने से क्या होता है

तुफ़ैल इदरीसी ने कहा- बीवी के कहने से उसको छोड़ दिया, जिसके पांव के नीचे जन्नत तोती है,, 

इनके अलावा सुहैल बड़ेलवी तथा अन्य शायरों ने भी अपने कलाम प्रस्तुत किए। देर रात तक चलने वाले मुशायरे में बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।

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