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हिंदी दिवस पर विशेष : विश्व भाषा की सफर में बढ़ती हिन्दी

      भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। इसे राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा दिया गया। अत: प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो भारत देश में बहुत भाषाएं बोली जाती है परन्तु हिंदी भाषा का अपना ही एक महत्व है जिसके कारण यह लोगों के हृदय में एक महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए हैl  क्योंकि पूर्व में काफी लम्बे समय से हिंदी भाषा का उपयोग होता आ रहा हैl  भक्तिकाल में पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक चारों दिशाओं में अनेक संतों द्वारा हिन्दी भाषा में ही रचना की गयी है। स्वतंत्रता के समय के राजनेताओं जैसे राजाराम मोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सुब्रह्मण्य भारती आदि द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का सपना देखा गया था। अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाने के कारण हिंदी को महात्मा गांधी ने 1917 में गुजरात के सम्मेलन में राजभाषा के रूप में स्वीकारे जाने के लिए ज़ोर दिया था।  

                 हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। यह करीब 11वीं शताब्दी से ही राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही है। उस समय भले ही राजकीय कार्य संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी में होते रहे हो परन्तु सम्पूर्ण राष्ट्र में आपसी सम्पर्क, संवाद-संचार, विचार- विमर्श, जीवन-व्यवहार का माध्यम हिन्दी ही रही है। अतीत के महापुरुषों जैसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी आदि ने राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से ही सम्पूर्ण राष्ट्र से सम्पर्क किया और सफलता हासिल की। इसी के कारण आजादी के पश्चात संविधान-सभा द्वारा बहुमत से ‘हिन्दी’ को राजभाषा का दर्जा देने का निर्णय किया था।  उसके बाद वह साहित्यिक भाषा के क्षेत्र में इसका विकास हुआ। समाचार-पत्रों में ‘पत्रकारिता हिन्दी’ का विकास हुआ। प्रादेशिक प्रशासन में हिमाचल प्रदेश,  उत्तराखंड,  मध्य प्रदेश, हरियाणा,  राजस्थान,  छत्तीसगढ़,  बिहार,  झारखण्ड राजभाषा हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं।  केन्द्रीय सरकार भी अपने अनेक कार्यो में हिंदी प्रयोग को बढ़ावा दे रही है।

             10 जनवरी, 2006 के दिन से विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा की गई। इससे दुनिया भर के लोगों को हिंदी की ओर आकर्षित करने की कोशिश बढ़ी है। हिंदी लगातार वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति और ताकत बढ़ा रही है, परन्तु उसे अपने ही घर में एक स्तर पर उपेक्षा भी झेलनी पड़ रही है। हिंदी बोलने वालों की संख्या में हर जनगणना में वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 1961 में जहां हिंदी भाषी लोगों की संख्या 30.4 फीसदी थी, वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर 43.63 फीसदी हो गई है। तमाम कोशिशों के बावजूद अब भी हिन्दी शैक्षणिक माध्यम नहीं बन पाई है। नीति निर्धारकों और प्रशासनिक तंत्रों का मुख्य कार्य अंग्रेजी में होता है और हिंदी में उसका अनुवाद भर होता है। यही वजह है कि वैश्विक प्रसार के बावजूद हिंदी ताकतवर और प्रतिष्ठित नहीं बन पा रही है। हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या हो या इंटरनेट पर हिंदी के विस्तार के आंकड़े, वे सभी उत्साहवर्धक है। आज दुनिया भर में 150 से ज्यादा देशों के 200 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। अमेरिका के 30 से ज्यादा विश्वविद्यालयों व शैक्षणिक संस्थाओं में हिंदी की पढ़ाई हो रही है। इसी तरह जर्मनी के 15 संस्थानों में हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन हो रहा है। ब्रिटेन की लंदन, कैंब्रिज और यार्क यूनिवर्सिटी में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। चीन, जापान, हंगरी, रूस और देशों में भी हिंदी की पढ़ाई हो रही है। यही नहीं भारत की बेहतर जानकारी के लिए दुनिया भर में करीब सवा सौ संस्थानों में हिंदी का अध्ययन- अध्यापन हो रहा है। विश्व में करीब 1 अरब से ज्यादा लोग न सिर्फ हिंदी बोल सकते हैं बल्कि इसे लिख और समझ भी रहे हैं। विश्व में हिंदी तीसरे स्थान पर भले ही हो परंतु नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान मलेशिया ब्रिटेन अमेरिका जैसे देशों में हिंदी के जरिए भारतीयता भी विकसित हो रही है। इसी तरह फिजी, मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम में हिंदी को अल्पसंख्यक भाषा का दर्जा हासिल हो चुका है।जापान, कोरिया, चीन, रूस, इंग्लैंड, इटली, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, अमेरिका, मेक्सिको आदि अनेक देशों में हिंदी भाषा और साहित्य पर शोध कार्य भी हो रहा है। मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, जुआना तथा सूरीनाम तो ऐसे देश है जहां भारत मूल की हिंदी प्रदेशों से ही लोग बसे हैं। 

                    किसी भी देश की सभ्यता को, वहां की भाषा से जाना जा सकता है। हिंदी भाषा ने बहुत कम समय में प्रगति की। हिंदी एक दिन में नहीं बनी थी, इसके शब्दों को मोती की तरह हमारे कवियों , साहित्यकारों ने एक सूत्र में पिरोया है। यह भारतेंदु जी, महावीर प्रसाद द्विवेदी जी, मैथिलीशरण गुप्त जी के अथक प्रयास का फल है। इसके प्रचार प्रसार ने चारों तरफ जोर पकड़ा और हिंदी भाषा उन्नति के मार्ग पर तेजी से अग्रसर होती चली गई। आश्चर्य की  बात है कि विश्व का शायद ही कोई साहित्य इतने कम समय में इतनी ऊंचाई को प्राप्त कर सका हो, क्योंकि हिंदी में जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है। यही कारण है कि हिंदी  भाषा ने अपने शुरुआती दौर में ऊंचाइयों को छुआ। दुनिया की कोई ऐसी भाषा हिंदी की सफलता की बराबरी नहीं कर सकती। हिंदी को बढ़ाने में फिल्म, मनोरंजन, रंगमंच का योगदान रहा है। जनसंचार के माध्यम से हिंदी भू-भाग पर फैला है और अंतरराष्ट्रीय बनाने में योगदान दिया है। धर्म-दर्शन सहित बच्चों के लिए तरह-तरह के मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों को रूपांतरित कर के हिंदी में प्रसारित कर रहे हैं। हिंदी फिल्म देश में ही नहीं विदेशों में भी बहुत पसंद की जाती है।

               संसार में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में मैंडेरिन चीनी, अंग्रेजी और स्पैनिश के बाद हिन्दी चौथे स्थान पर अपना स्थान सुनिश्चित करती हैl परन्तु दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा के रूप में देखा जाए तो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में अंग्रेजी के बाद हिन्दी का ही नाम आता हैl  हिंदी दरिद्र नहीं है। उसका अपना वैभव है। खतरा भाषा को नहीं है। वह तो बहता नीर है। नदी है। उसे रोकेंगे तो वह समाप्त होगी।

      कई देश ने अपनी अपनी भाषा में ही ज्ञान विज्ञान की पूर्णता प्राप्त की है। अंग्रेजी भाषा जिन पर बुरी तरह हावी हो चुकी है। वही यह तर्क देते हैं कि बिना अंग्रेजी के भारत पिछड़ जाएगा। भारत में केवल 2% लोग ही अंग्रेजी जानते हैं। यदि जापान और जर्मनी जैसे देश अंग्रेजी के बिना अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से विज्ञान की नवीनतम जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, तो हम अपनी हिंदी के जरिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

        जब हम हिन्दी भाषी प्रदेशों में अंग्रेजी भाषा में सड़कों के संकेत दुकानों के नामपट्ट लिखा होता है। कई बार शिक्षित हिंदी भाषी की जब विवाह, शादी समारोह में निमंत्रण पत्र अंग्रेजी भाषा में छपते हैं, तो यह बहुत शर्मनाक को लगता है। यह तो हाइब्रिड दौर है, मोबाइल चार्ज करना है, ईएमआई जमा करना है, तो अंग्रेजी से गुजरना ही होगा। आकाशीय चैनलों से उतरने वाली और मोबाइल से बेडरूम तक घर-घर में आज हिंदी पड़ोसी जा रही है।  आज सूचना, संचार एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चलते पूरे विश्व की दूरियां सिमट गई है। हिंदी की दुनिया केवल अपने देश तक ही सीमित नहीं है बल्कि विश्व स्तर तक फैल चुकी है। आज के वातावरण में हिंदी के चारों ओर सुनाई दे रहा है। हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों को अंग्रेजी के बहिष्कार तथा हिंदी के उपयोग का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए।     

लेखक : डॉ नन्दकिशोर साह




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