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वर्तमान समय में मुस्लिम सियासत

     दोस्तों अभी देश के पाँच राज्यों में हुए चुनाव भारत के मुसलमानों की सियासी सूझबूझ और ग़ैर मुसलमानों की भाजपा के लिए वफ़ादारी की इन्तेहा थी, लेकिन इन चुनाव के बाद भारत में मुसलमानों के लिए सियासत के रास्ते भी तंग हो चुके हैं और हालात बहुत तेज़ी से उस ओर बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं जिनका समझना भारत के मुसलमानों के लिए जरूरी है तो आइए इस ज़मीनी हक़ीक़त को सुबूत और दलाइल की बुनियाद पर बारीक़ी से समझने की कोशिश करते हैं जिस से हम वक़्त रहते सियासत से झूँठी उम्मीद छोड़ कर अपनी सफ़ों को सीधा कर सकें और आने वाले हालात का मज़बूती से मुक़ाबला कर सकें।

        बात उत्तर प्रदेश के चुनाव की करते हैं जहाँ छः सात करोड़ मुसलमानों ने नव्वे पंचान्वे फ़ीसद वोट एक तरफ़ा समाजवादी पार्टी को दिया, और ये कोई मामूली बात नहीं थी बल्कि ये मुसलमानों की सियासी बेदारी और उनके सियासी इत्तेहाद की इन्तेहा थी, मुल्क तो छोड़िए बल्कि पूरी दुनिया में इतनी बड़ी आबादी का इस तरह एक जगह वोट करने की मिसाल ढूंढें नहीं मिलेगी, इसी चुनाव में इतनी एक जुटता तो वो ग़ैरईस्लामी जातियाँ भी नहीं दिखा पाईं जिनकी अपनी अपनी पार्टीयाँ थी और जीतने पर सत्ता उनके ही हाथ आनी थी, वहीँ मुस्लिम समाज के लोगों ने सैकड़ों जातियों, फ़िरक़ों और पार्टियों में बंटे होने के बावजूद इस तरह इत्तेहाद से वोटिंग की के जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती, अगर आज दोबारा उप्र में चुनाव करवा दिए जाएं तो भी ये कारनामा नहीं दोहराया जा सकेगा इसलिए ये गुज़रा हुआ चुनाव मुसलमानों की सियासी बेदारी और इत्तेहाद की इन्तेहा थी


       वहीँ दूसरी तरफ़ बहुसंख्यक समाज का भाजपा को फिर से सत्ता सौंप देना उसकी भाजपा के लिए वफ़ादारी की इन्तेहा थी, जो कि जर्मनी में जर्मनों की हिटलर से वफ़ादारी के बाद दूसरा ऐसा मौक़ा है, .... और ये वफ़ादारी इसलिए बेमिसाल और जर्मनों से भी बड़ी है कि जब कोरोना महामारी में इंसानों की लाशें कौवे और कुत्ते नोंच रहे थे, जब हज़ारों मील पैदल चलते हुए भूक प्यास से मजदूर मर रहे थे, जब सरकारी कंपनियां बेच कर बेरोजगारों पर लाठियाँ बरसाई जा रही थीं, जब कोरोना से मरते लोगों के लिए दवा और ऑक्सिजन यमराज बन चुकी थी, जब कारोबार बर्बादी के रिकॉर्ड बना रहे थे, जब किसान और व्यापारी आत्महत्या कर रहे थे, जब किसान आंदोलन में सात सौ किसान मर गए थे, जब अपना हक मांगते किसानों पर सत्ताधारी गाड़ियाँ चढ़ा रहे थे, जब यूक्रेन में छात्र युद्ध में फंसे हुए थे, जब महंगाई और लूट आसमान छू रही थी ,और तब दूसरी तरफ़ वो ही लोग भाजपा को वोट दे कर गर्व कर रहे थे।


      लेकिन मुसलमानों के बेइंतेहा इत्तेहाद के बावजूद समाजवादी पार्टी का हार जाना असद्दुदीन औवेसी और डॉक्टर अय्यूब के उस दावे की जीत थी जिसमें वो कहते हैं कि मुल्क की हर सियासी जमात मुसलमानों को सिर्फ़ ग़ुलाम रखना चाहती है उनको हिस्सेदारी नहीं देना चाहती.. भले ही मुसलमानों ने उप्र में कुल आधा फ़ीसद वोट भी मीम पार्टी और पीस पार्टी को नहीं दिया लेकिन उन्होंने औवेसी की मत्तहिद हो जाने की अपील पर पूरा अमल किया, हालाँकि वक़्त और हालात के हिसाब से मुसलमानों का ओवेसी को वोट न करना उनकी सियासी बेदारी और इत्तेहाद का  बादतरीन नमूना था, लेकिन ये कहना के ओवेसी की वजह से भाजपा जीत जाती है या उनकी वजह से चुनाव साम्प्रदायिक हो जाते हैं ये बेहद जाहिलाना और बेवक़ूफाना बात है, ये बातें करने वाले कुछ बेवक़ूफ़ मुसलमान क्या ये बता सकते हैं कि मुसलमानों के एक तरफ़ा वोट के बावजूद भी समाजवादी को ख़ुद उनके लोगों ने वोट क्यों नहीं दिया, बसपा को उनके लोगों ने वोट क्यो नहीं दिया, रालोद को उनके लोगों ने वोट क्यों नहीं दिया, जबकि इन पार्टियों के जीत जाने से सत्ता उन्ही के हाथ में रहती मुसलमान तब भी इनकी ग़ुलामी ही करते.. लेकिन एक समुदाय आपको बर्बाद करने के लिए अपना सब कुछ छोड़ देने पर आमादा है और आप इतने अंधे हो रहे हैं कि सिर्फ़ अपने लोगों को नीचा दिखाने में लगे हैं, वो भी उन लोगों को जो आपको आपका हक़ दिलाने के लिए अपनी ज़िंदगियाँ दाव पर लगा रहे हैं, और जो लोग ये सोचते हैं कि भाजपा की इस बार सीटें घटी हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कमज़ोर हुई है बल्कि इसलिए कि मुसलमानों ने एक तरफ़ा बेमिसाल वोटिंग की थी, वर्ना तो बसपा का जो खेल था अगर वो मुसलमानों को बिखेरने में कामयाब हो जाती तो भाजपा इस बार पहले से कहीं ज़्यादा सीटें लाती।


        ख़ैर अब आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आने वाले वक़्त और हालात की जिसमें सेकुलर सियासत अब आपके लिए गुमराही से ज़्यादा कुछ नहीं बची है, क्योंकि इस चुनाव के बाद इस से बहतर आप कर नहीं सकते और इस से नीचे वो आ नहीं सकते, क्योंकि वो बदतरीन दौर, नुक़सान और हालात से गुजरने के बाद भी भाजपा को देखना चाहते हैं तो आप उनको किसी सूरत वहाँ से अलग नहीं कर सकते... लेकिन अभी भी कुछ पार्टियाँ आएंगी और आपसे बोलेंगी के इस चुनाव की तैयारी करो उस चुनाव की करो.. जबकि सच ये है कि ऊपर से हरे, लाल, पीले, नारंगी दिखने वाले तमाम संतरों की अंदर से हर फांक ऑरेंज कलर की है, और ये तुमको सियासत में फंसा कर और उम्मीद दिला कर इसलिए उलझाए रखना चाहते हैं कि तुम आने वाले वक़्त को अपने दीनी नज़रिए से कभी न देख सको और उस वक़्त के लिए ज़ेहनी तौर से भी तैयार न हो सको, जबकि ये पसन्द नापसंद(इंतेख़ाब) वाला खेल 2024 में सिर्फ़ एक ऐलान से ख़त्म कर दिया जाएगा और आज आपके साथ खड़े हुए सेक्युलर दल आपको देख कर हंस रहे होंगे, जानते हो क्यों.. क्योंकि ये आपके दीन को आपसे ज़्यादा पढ़ते हैं और जानते हैं इसलिए आज आप सिर्फ़ इनकी बिछाई हुई पिच पर बेटिंग कर रहे हैं, और ये इस बात में पूरी तरह कामयाब भी हैं क्योंकि आज मुसलमानों को दीनी नज़रिए से आने वाला वक़्त बताया जाता है तो पांच फ़ीसद मुसलमान भी उसको मानने को तैयार नहीं हैं, और ख़ुद से दीन और दुनिया पर ग़ौर ओ फ़िक्र करना तो जैसे इस दौर के मुसलमानों की किस्मत में ही नहीं है, वल्कि वो आगाह करने वाले लोगों का मज़ाक़ बनाते हैं।



        इसलिए अब मुस्लिम नौजवानों को चाहिए कि वो सेकुलर सियासी पार्टियों का भूत अपने सर से उतार दें और उसको बस एक वक़्ती हालात की ज़रूरत तक महदूद रखें वर्ना ये धोके की सियासत आपको हर बार उम्मीद दिला दिला कर शिकस्त देती रहेगी और आपके हौसले और जज़्बे को इतना कमज़ोर कर देगी के आप एक दिन ज़ुल्म के आगे घुटने टेक देंगे और अपने आप को बहुत कमज़ोर मान बैठेंगे, इसके साथ ही नौजवान दीन, हदीस व कुरान का ज़्यादा मुताअला करें और बूढ़ी व अपाहिज मुस्लिम तंज़ीमों से कोई उम्मीद न रख कर अपने मुआशरे में इत्तेहाद और मुहब्बत की मुहिम चलाएं जो फ़िरक़ापरस्ती से पाक हो, क्योंकि ये माज़ूर तंज़ीमें पहले ही क़ौम के दिलों से जज़्बा ए जद्दोजहद ख़त्म कर के क़ौम को मसलेहत के नाम पर बुज़दिली और इख़्तेलाफ़ की राह पर डाल चुकी हैं, मुस्लिम नौजवानों को कमान अपने हाथ में ले कर अपनी दस्तार संभाल लेनी चाहिए और अपनी सफ़ों को सीधा करने के लिए अभी से महनत करनी चाहिए और अपनी कयादत को मजबूत करना चाहिए किसी भी दूसरे समुदाय के आंदोलन से ख़ुद को दूर रखने के साथ हुकूमत की मुख़ालिफ़त नहीं करनी चाहिए, साथ ही अपने मुल्क में मुहब्बत और भाईचारे की मिसाल क़ायम कर के क़ौम व मुल्क को नई बुलंदी अता करनी चाहिए क्योंकि अब आपके पास बहुत वक़्त नहीं है क्योंकि आने वाले कुछ वाक़्यात आपके सर पर आ चुके हैं, और अगर अब भी आप नहीं जागे तो फिर बहुत देर हो जाएगी इसलिए नौजवानों उठो आओ हम सब मिलकर अपनी कयादत को मजबूत करें। 


लेखक मोहम्मद मोहसिन अंसारी

बिसवां सीतापुर उत्तर प्रदेश

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