Subscribe Us

अरबी भाषा सीखना क्यों जरूरी है?

 

 

     मुसलमानों के सभी बच्चों को अरबी जबान सीखना चाहिए क्योंकि मुसलमानों का दीन और मजहब अरबी भाषा में है, अगर वही अरबी भाषा को नहीं सीखते हैं तो दुनिया के दूसरे तमाम लोगों को अरबी भाषा कैसे सिखायी जायेगी कैसे अरबी को फरोग दिया जाएगा। 

          अगर अरबी भाषा नहीं आती है तो समझो नव्वे फ़ीसद दीन उसको नहीं आता है आज जब लोग नमाज (सलात) पड़ने के लिए जाते हैं तो पूरी नमाज अरबी में होती है और वह बंदा क्या रब से कह रहा है उसको खुद ही नहीं पता होता है कि उसने नमाज में क्या पढ़ा है उसको यह भी नहीं मालूम होता है उसने अल्लाह की तारीफ बयान की है और उसने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम को सलाम भेजा है, जब उसको यही नहीं मालूम है कि नमाज में उसने क्या किया है, जबकि नमाज में एक नमाजी अपने रब की तारीफ बयान करता है, और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलाम भेजता है जो उसने अमल से किया है लेकिन वह कुरान की जो आयत पढ़ता है उसका मतलब भी नहीं समझता है तो कैसे? वह सिर्फ पढ़ता ही रहता है, लोगों को चाहिए कि समझने की कोशिश करें, कि उसने कुरान के कौन से हिस्से की तिलावत की है उसका समझना बहुत जरूरी है जब तक इंसान उसको समझना नहीं शुरू करेगा उस वक्त तक मुसलमानों के हालात ऐसे ही रहेंगे।

        जब इमाम जुम्मे के दिन मेंबर पर चढ़कर खुत्बा देता है तो यह खुत्बा अरबी भाषा में होता है उसको लोग समझते नहीं हैं, जब लोग उसको समझते नहीं, खुत्बा के अल्फाज का मतलब नहीं जानते हैं तो उससे कोई फायदा नहीं उठाया जा सकता है और कोई सवाब नहीं मिलने वाला है। आज भी हिंद की मस्जिदों में जाकर देखो, जो लोग मस्जिद में नमाज जुमा अदा करने के लिए आए हैं उनमें से पूरी मस्जिद में शायद ही एक दो लोग अरबी जानते हो लेकिन बाकी सभी लोग सिर्फ सुनते हैं समझते नहीं हैं और मूर्ख बनकर बैठे होते हैं उनको मालूम ही नहीं होता है कि इमाम साहब मजहबे इस्लाम के उसूल और कवानीन की बात कर रहे हैं और उनको मालूम ही नहीं होता है कि इमाम साहब हालाते हाजरा पर बयान कर रहे हैं। यह मुसलमानों की कमजोरी है कि उन्होंने अरबी को सीखा ही नहीं और सीखना भी नहीं चाहते हैं ।

          हम जिस मुल्क में रह रहे हैं यहां पर अरबी भाषा को सरकारी भाषा का दर्जा हासिल नही है यही वजह है कि लोग इस पर जरा भी तवज्जो नहीं कर रहे हैं मदरसों का निजाम भी दुरुस्त नहीं है मुसलमानों की कुल आबादी में सिर्फ दो या तीन परसेंट लोगों को अरबी भाषा सिखाई जाती है। मदरसों में तालीम व तरबियत का दुरुस्त निजाम होना चाहिए जो मुसलमानों की कुल आबादी को अरबी भाषा सिखा सके, और उन्हें दीन व मजहब के उसूल से वाबस्ता कर सके, इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि अपने बच्चों को अरबी जबान सिखा कर उनको एक सच्चा मुसलमान बनाएं, अरबी मुसलमानों के लिए इतनी जरूरी है जितनी कि इंसान को जिंदा रहने के लिए गिज़ा जरूरी है जिस तरह खाने के बगैर आदमी जिंदा नहीं रह सकता उसी तरह अरबी के बिना मुसलमानों का दीन व मजहब और ईमान जिंदा नहीं रह सकता है।


         मुसलमानों को अरबी भाषा का पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि इस जबान में कुरान नाजिल हुआ है और कुरान दुनिया की सबसे अच्छी किताब है और मालूमात ला तादाद है यह वह किताब है इसमें कोई शक नही है यह हिदायत है लोगों के लिए,और यह हिदायत है मोमिनो के लिए, इस किताब को अल्लाह तआला ने कयामत तक के आने वाले लोगों के लिए हिदायत का जरिया बनाया है। आज से कमोबेश पन्द्रह सौ साल पहले जब दुनिया में लिखने का कोई आम रिवाज नहीं था कि कोई वक्त के हादसात को कलम बंद करता। उस जमाने में कुरान ही एक वाहिद किताब है जो तमाम मालूमात का जरिया साबित हुयी, आज भी तारीख की बात करें तो जो कुरान में मिल जाता है उसकी तो इतिहासकार तसदीक करते हैं वरना उसको नकार देते हैं और तारीख के पढ़ने वालों को चाहिए कि कुरान को गहराई से पढ़ा करें, जिससे तारीख की घटनाओं को साबित करने में कोई मशक्कत ना हो, आज भी पूरी दुनिया के लोगों में यही चलन है कि वह कुरान के जरिए से नई-नई मालूमात रिसर्च फराहम कर रहे हैं, कुरान के जरिए अल्लाह तआला ने लोगों को पुराने जमाने की घटनाआओं के बारे में बताया है जैसे कि असहाबे फील का वाकिया यह रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश से 52 या 53 दिन पहले का वाकिया है, लेकिन अल्लाह तआला ने उसको कुरान में फरमा कर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तारीख के मुताले के जरिए से मालूमात फराहम कर रहे हैं, इससे पता चलता है कि कुरान सिर्फ हाल का ही जरिया नहीं है बल्कि उससे माजी़ को समझकर मुस्तकबिल को रोशन किया जा सकता है।


           अल्लाह ताला ने फरमाया है कि यह कुरान कयामत तक आने वाले लोगों के लिए मशअले राह है और जो कुरान और रसूल अल्लाह की जिंदगी के मुताबिक चलेगा वह दुनिया और आखिरत दोनों में कामयाब होगा उसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है जो इंसान को कामयाबी की तरफ लेजा सकता हो। मौलाना मुफ्ती सरवर फारुकी नदवी साहब ने फरमाया है कि दो बिन्दुओं को मिलाने वाली एक ही रेखा सीधी हो सकती है इस तरह आज भी एक ही सीधा रास्ता है वह है मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का रास्ता है जो मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रास्ते पर चला, वह कामयाब हुआ। अगर कोई कहे, इस से हटकर कोई कामयाबी का रास्ता है तो समझो कि वह कामयाबी का रास्ता नहीं बल्कि गुमराही का रास्ता है। और उस रास्ते पर चलकर गुमराही मुकद्दर होगी। अब सवाल यह है कि अगर कोई मुसलमान है लेकिन उसको अरबी भाषा नहीं आती है वह अरबी न पढ़ सकता है न लिख सकता है न समझ सकता है तो क्या वह इस्लाम के मजहब और मोहम्मद साहब की तालीम से पूरा फायदा उठा सकता है? इसका जवाब यह है कि अगर कोई अरबी भाषा पढ़ लेता है और उसको अच्छी तरह समझ सकता है तो वह पूरा पूरा फायदा उठा सकता है वरना नहीं, इसलिए हर मुसलमान को अरबी भाषा मुकम्मल तौर पर सीखनी चाहिए।


          अगर अरबी भाषा की खास अहमियत है तो हमारे मुल्क हिंदुस्तान में अक्सर मुसलमान ऐसे हैं जिनको अरबी जबान नहीं आती उनके साथ क्या होना चाहिए? हमारे मुल्क हिंदुस्तान में अक्सर लोगों को अरबी भाषा नहीं आती है जबकि अरबी भाषा बहुत आसान है और उसका सीखना और पढ़ना बहुत मजा देता है लेकिन हकीकत यह है कि उसको लोगों ने खासकर मौलवियों ने बहुत मुश्किल बना दिया है और हमारे मुल्क की तालीमी निजाम भी कुछ ऐसा है कि उसमें अरबी भाषा को कोई खास अहमियत नहीं दी जाती है यही वजह है कि लोगों में अरबी भाषा लिखने पढ़ने का शौक नहीं है, और जब अरबी भाषा नहीं आती तो अरबी उसूल भी नहीं आते,और रही बात दीन की तो दीन चूंकि अरबी भाषा में है इसलिए दीन भी नहीं आता, हमारे मदरसों का निजाम कुछ ऐसा है कि उसमें सभी बच्चों को अरबी नहीं पढ़ाई जाती है जो बच्चे हिफ्ज की तालीम लेते हैं उनको सिर्फ हिफ्ज पढ़ाया जाता है और जो बच्चे आलिमत पढ़ते हैं उनको अरबी भाषा की  तालीम दी जाती है। हमारे यहां के आलिमों को हमने कहते हुए सुना है की अरबी सबके लिए जरूरी नहीं है उनका कहना है कि आम मुसलमानों को बस दीन की थोड़ी सी मालूमात काफी है उनकी इसी सोच की वजह से आज हिंदुस्तान का मुसलमान अरबी भाषा से दूर है जबकि मरने के बाद कब्र में जो सवाल होंगे वह अरबी जबान में होंगे और उनका जवाब भी अरबी जबान में ही दिया जाएगा। सोचो उस इम्तिहान को कैसे पास किया जाएगा? आज इस पर गौर फिक्र नहीं किया जाता है, कि उसे अरबी भाषा सीखनी चाहिए और अपने बच्चों के मुस्तकबिल के बारे में नहीं सोचता है कि अगर उसने अरबी भाषा नहीं पढी़ है तो कम से कम अपनी औलाद को अरबी भाषा की तालीम दीजाए ।


           जब तक हमारे मदरसों का दर्सी निजाम और मदरसों के मुदर्रसीन का मिजाज नहीं तबदील होगा, तब तक इस कौम का यही हाल रहेगा। शुरू से ही अरबी भाषा की तालीम दी जानी चाहिए, इसी से उम्मत का भला हो सकता है, मुसलमानों का खुद का मसला है अगर कामयाब होना है तो वह खुदभी भाषा सीखने और अपने बच्चों के लिए मदरसे के दर्सी निजाम को बदलकर अरबी में तालीम को रिवाज दें, और मुल्क में एक एक मुस्लिम फर्द को अरबी सिखाएं और खासकर अपनी औलाद की फिक्र करें कि उनकी औलाद को कैसे अरबी भाषा सिखाई जाए। वालिदैन को चाहिए कि वह ऐसे स्कूल और मदरसे में अपने बच्चों का दाखिला कराएं कि जिसमें अरबी भाषा सिखाने का मुकम्मल तालीमी निजाम हो अगर ऐसे स्कूल और मदरसे नहीं है तो मुसलमान खुद ऐसे मदरसे और स्कूल का इंतजाम करें जिससे कि अपनी औलाद को अरबी भाषा की तालीम और कुरान वह हदीस की मुकम्मल तालीम दी जा सके। मुसलमानों को इस पर गौर व फिक्र करने की जरूरत है। मेरी यही राय है कि अपने बच्चों को ऐसे मदरसा या स्कूल में दाखिला कराएं जहां पर अरबी भाषा मुकम्मल तौर पर सिखाई जाती हो।

  लेखक - मोहम्मद मोहसिन अंसारी, बिसवां सीतापुर उत्तर प्रदेश भारत

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ