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खुशियों की इन्तहा को ईद कहते है! ईद दर हक़ीक़त अमन का पैगाम है

   मोहम्मद सैफ साबरी

  लखनऊ। दुनिया की तमाम क़ौमों तमाम मज़हब के मानने वालों की अपनी तहजीब अपनी रिवायात, रसूमत एवं कुछ खास तेह्वार ऐसे होते हैं। जिसको वो जशन के रूप में मनाते हैं। खुशी का इज़हार करते हैं। ठीक इसी तरह मुस्लिमों में भी ईदैन दो इदें होती है। एक ईदुल फित्र दूसरी ईदुल अज़्हा ईदुल फित्र रमज़ान के आखरी रोज़े के दिन चाँद देखकर मनाते है। और ईदुल अज़हा 10, तारीख को क़ुर्बानी कर मनाई जाती है। ईदुल फित्र एक माह के रोज़े, इबादत के रूप में बतौर इनाम यह तेह्वार मुसलमानों को रब्बे कायनात की तरफ से अता हुआ एक तोहफा है। इस दिन बन्दा अपने रब का शुक्रिया अदा करने के लिये दो रकात नमाज़ अदा करता है। इसलिये कि उसको नमाज़ और रोज़े रखने की तौफ़ीक़ अल्लाह पाक ने अता की।

इस बार ईद की खुशी और भी ज़ियादा हो रही कि दो वर्ष बाद मुसलमानों को ईदगाह में नमाज़ पढ़ने को मिलेगी, क्योंकि पिछ्ले दो वर्ष कोरोना के काले साये की भेंट चढ़ गए, जिसकी वजह से कोई तेह्वार कोई क़ौम खुल कर नहीं मना अलविदा से लेकर ईद सहित तमाम इबादात को लोगों ने अपने घरों में अंजाम दीं। ईदुल फित्र का जशन दो हिजरी यानी 624 से शुरु हुआ ईदुल फित्र यौमे तशक्कुर यानी अल्लाह पाक का शुक्रिया अदा करने का दिन है। इस दिन की अहमियत और भी बढ़ जाती है। इस लिये रब का हुक्म है कि आपस में सब एक दूसरे को मुबारकबाद दें गले मिलें दिलों के दर्मियां कोई फासले न रहें किसी तरह दिल में मैल बाक़ी नही रहे, हर अमीरो गरीब खुश रहे एक दूसरे को मुबारकबाद दे भारत देश में ईद का मह्त्व और भी बढ जाता है। क्योंकि यहां मिली जुली आबादी के कारण यहां विभिन्न धर्मों के मानने वाले भी ईदुल फित्र पर मुसलमानों के गले लग कर मुबारकबाद देते है। और साथ मिल कर सिवईं खाते हैं। 

  इस तरह इस तेह्वार में चार चाँद लग जाते हैं। इस्लामिक शिक्षा के अनुसार वो तेह्वार जिसमें गरीब,मिसकीन,बे सहारा लोग शरीक ना हो सकें अल्लाह पाक की नज़र में न पसंदीदा है। रसूले खुदा ने फरमाया रमज़ान में की गई इबादत जब तक अल्लाह पाक के यहां क़ुबूल ना होंगी जब तक साहिबे निसाब शख्स (मालदार व्यक्ति) फित्रा एवं ज़कात ना निकाल दे, फित्रा और ज़कात मज़हबे इस्लाम में इस लिये भी अहम है की इस से गरीब और  बे सहार लोग भी आपकी तरह खुशिया मना सकें, आमिर साबरी ने बताया, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 2, हिजरी यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1441साल पहले) ईद-उल-फितर का तेह्वार मनाया गया था। रसूले खुदा मुहम्मद सल्ल्लाहो अलैहिवसल्लम ने ही इन दो तेह्वारों के महत्व को बताया है। एक ईद-उल-फितर और ईदुल अज़हा, ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। हर मालदार व्यक्ति को  ईद की नमाज से पहले ज़कात एवं फ़ित्रा देना ज़रूरी होता है। जिस से कमज़ोर मुसलमानों के बच्चे नए कपड़े पहन सके और ईद के दिन अच्छा खाना खा सके, हर मुसलमान पर फर्ज है। सभी का ध्यान रखना, कुरान में ज़कात एवं फ़ितरे को अनिवार्य बताया गया है। जकात यानी टैक्स आपकी कमाई हुई दौलत पर ढाई % गरीबों का हक़ है जिसको देना वाजिब है।

   अल्लाह पाक के हुक्म के अनुसार   अपनी चल अचल संपत्ति को सलामत रखने के लिए, एक हिस्सा गरीब एवं जरूरतमंदों को दान के रूप में ज़रूर दें। ईद का चांद देखने के बाद मुसलमान रात भर मस्जिदों में इबादत करते हैं और अल्लाह के दुआ करते हैं। सुबह फज्र की अजान के बाद ईद की नमाज की तैयारी शुरू हो जाती है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह या जामा मस्जिद में एकत्रित होकर नमाज अदा करते हैं। नमाज की अदायगी के बाद एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। ईद-उल-फितर के मौके पर खास पकवान् तैयार किये जाते है। जिसमें खासतौर से मीठी सेवईं वगैरा होती है।

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