Subscribe Us

दस साल की उम्र में उम्मे कुलसूम ने रखा रोजा

  मोहम्मद सैफ साबरी

  लखनऊ। शरीयत के एतबार से 12 साल की उम्र पर नमाज़ एवं रोजा फर्ज होते है। मगर जब कोई बच्चा 12 साल से कम उम्र में रोजा रख लें तो मान बाप ही नहीं बल्कि आस पड़ोस के लोग भी उस बच्चे पर गर्व करते हैं। और जब कोई छोटा बच्चा रोज़ा रखता है। तो वो अन्य इस्लामिक नियमों का पालन भी मज़बूती से करता हैं। जैसे रोज़े की हालत में वो पाक साफ रहने के साथ साथ नमाज़ की पाबंदी भी करता है। और अन्य सामाजिक बुराईयों से वो अपने को पूरी तरह से  बचाता है। अक्सर रमज़ान के महीने में देखने को मिलता है। कि बहुत छोटे छोटे बच्चे ज़िद करके रोज़े रख लेते है। और उनकी ज़िद के आगे घर के बड़े यानी माँ बाप भी खामोशी अख्तियार कर जाते हैं। यह वाहिद ऐसा अमल है। जो बड़ों से कहीं अधिक बच्चों मेँ पाया जाता है। बाकायदा सुबह सहरी खाने के साथ साथ वह फज्र की नमाज से लेकर पांचो वक़्त कि नमाज़ भी पाबंदी से अदा करते हैं। उसके बाद कुरान पाक की तिलावत करते हैं। जिस से उनका रोजा पूरा हो। रमजान के इस पाक महीने की ओर अपने माता-पिता का रुझान, जोश और आस्था देखते हुए बच्चे जब रोजा रखने की इच्छा जताते है। तो माँ बाप भी फूले नहीं समाते। आज मात्र दस साल कि उम्र में उम्मे कुलसुम ने पहला रोजा रखा। इतना ही नहीं, रोज़े के साथ साथ नमाज़ और क़ुरआन कि तिलावत को भी अपनी इबादत में शामिल किया! उम्मे कुलसुम के पिता शरफुद्दीन खान ने बताया बच्चे ने अपनी जिद और आस्था के चलते रोजा रखा। जब हमने उसे रोकना चाहा तो ज़िद कर गई और ना कुछ खाया और ना पिया इस तरह उसने आपना रोज़ा पूरा किया और 16 घंटे के बाद समय पर ही उसने आफतार यानी रोज़ा खोला अब उम्मे कुलसूम पूरे  रोज़े रखना चाहती है!

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ