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क्यों रूठ गए हमसे ऐ कागा और गौरैया

  सत्य स्वरूप संवाददाता

   सिद्धार्थनगर। तरक्की का नशा हमारे सिर पर चढ़कर बोल रहा है,रूठ गए हमसे कागा,रूठ गई हमसे गौरैया । वो भी क्या दिन हुआ करते थे जब माँ गेहूं धो कर छत पर सुखा ने के लिए फैलाती थी और हमारी जवाबदारी होती थी छत पर बैठकर नन्ही नन्ही सी सुंदर चिड़ियाओं (गौरैया) को गेहूं को चुघने से बचाना, हमारी गेहूं से नज़र हटी और गौरैयाओं की दावत शुरु हुई,क्या दिन थे वो सुबह की नींद चिड़ियाओं के चेहक ने से खुलती थी,कहां गए हमारे बचपन के वह साथी,क्यों रूठ गए हमारे बचपन के वह साथी गोरैया और कागा,आप कागा का मतलब तो जानते ही होंगे,कागा को कौवा भी बोला जाता है,याद करो वह दिन जब छत पर बैठकर कौवा कॉउ कॉउ   करता था, मां और दादी खुश हो जाती थी और उनको लगता था घर पर कोई मेहमान आने वाला है मेहमान आए या ना आए पर तैयारी पूरी हो जाती थी मेहमानों के लिए । कौवा भी रूठ गया और मेहमान भी रूठ गए,दोनों इतने दूर चले गए, कौवों ने हमारी बस्ती और शहर छोड़ दिए,और मेहमान हमारे दिलों से दूर हो गए, पहले घर पर मेहमान आते थे,साथ में अपना ढेर सारा सामान लाते थे,हफ्ता दस दिन हमारे घर पर रुकते थे,जब उनके जाने का समय आता था तो हम बच्चे उनका सामान छुपा देते थे,कुछ दिन और रुक जाएं,कहां गई वह मोहब्बत हमारे सिर पर तरक्की का नशा चढ़कर बोल रहा है,हम भूल गए कागाओं को हम भूल गए गौरैया को,भूल गए अपने मेहमानों को हम भूल गए हमारी मेहमान नवाज़ी को, पहले मेहमान आते थे उनसे पूछा नहीं जाता था कि आप खाना खाएंगे बगैर उनसे पूछे उनके लिए भोजन तैयार किया जाता था और जबरन बैठा कर उन को भोजन खिलाया जाता था,और अगर आज मेहमान घर पर आ जाए तो ऐसा लगता है घर में कोई तूफान आ गया हो,रस्म अदायगी के लिए मेहमानों को पानी और चाय दी जाती है कुछ बिस्किट प्लेटो में रख दिए जाते हैं और इंतजार किया जाता है कब मेहमान चाय पिएं और वापस अपने घर जाएं ।

अब वह दिन दूर नहीं जब बच्चे पूछा करेंगे पापा कौवा,गोरैया  चिड़िया दिखने में कैसे होते थे, हम बच्चों को कौवा एवं गौरैया की तस्वीरें दिखाया करेंगे और बताएंगे बेटा गौरैया इसे कहते हैं और कौवा इससे कहते हैं, जैसे डायनासोरों की तस्वीर हम देखकर खुश हो जाते हैं ऐसे ही आने वाली पीढ़ी कौवा गौरैया और गिद्ध की तस्वीरें देखकर खुश हो जाया करेगी । 

गौरैया एवं कौवों के विलुप्त होने के अनेक कारण है,मोबाइल टावरों से निकलता रेडिएशन  तापमान का बढ़ना, शहरों के विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जिसके कारण तापमान बढ़ना और यह पक्षी ज्यादा तापमान सहन नहीं कर पाते हैं। प्रदूषण और विकिरण के चलते शहरों का तापमान बढ़ रहा है। घरेलू गौरैया एवं कौंवे ऐसे पक्षी है जो धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं।

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