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बाघ जैसे वन्य जीव हमारी संस्कृति तथा जीवन का अभिन्न हिस्सा चंदेश्वर प्रसाद : डीएफओ

  असदुल्लाह सिद्दीकी

सिद्धार्थनगर। वन्य जीव हमारी संस्कृति तथा जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इस तंत्र को संरक्षित करने की जिम्मेदारी हम सभी की है। विश्व बाघ दिवस एक महत्वपूर्ण अवसर है जब हम वन क्षेत्रों के समीप रहने वाले समुदायों तक यह अपील पहुंचा सकते हैं।

बाघों को संरक्षण देने और उनके प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने के लिए 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस  मनाया जाता है ।बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है ,इसके बावजूद भारत में वर्ष 2010 से बाघ विलुप्त होने के कगार पर हैं ।उनके संवर्धन व विकास हेतु हमें सतत जागरूक रहना चाहिए ।पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा बाघ भारत में पाए जाते हैं। बाघों और जंगली जानवरों से जंगल की सुरक्षा होती है और जंगल से सभी प्राणि जगत को शुद्ध प्राणवायु ऑक्सीजन ,लकड़ी,फल आदि मिलता है। वन्य प्राणी प्रकृति के अनिवार्य अंग है। इनके संरक्षण और विकास से प्रकृति का विकास होता है। उक्त विचार अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर चंदेश्वर सिंह डीएफओ सिद्धार्थ नगर ने वन कर्मियों व जनपद वासियों को संबोधित एक संदेश के माध्यम से व्यक्त किया। डीएफओ ने कहा कि वर्तमान समय में देश में कुल 52 टाइगर रिजर्व है। भारत का पहला टाइगर रिजर्व जिम कार्बेट है ।भारत का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व नागार्जुन सागर श्रीशैलम है ।जबकि देश में सबसे छोटा टाइगर रिजर्व महाराष्ट्र के पेंच में है। देश के कुल 18 राज्यों में बाघ पाए जाते हैं। 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2967 की संख्या में  बाघ है। देश में सबसे ज्यादा 526 बाघ मध्यप्रदेश में हैं ।आज सरकार द्वारा वन्य प्राणियों के विकास व संवर्धन के प्रति संवेदनशीलता व जागरूकता के कारण देश के केरल, महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है, जो प्रकृति के लिए एक बेहतर संदेश है ।आज के इस अवसर पर हम सभी को वन्य प्राणियों और बाघों के अवैध शिकार पर रोक लगाते हुए बाघों के पर्याप्त संरक्षण और विकास हेतु  कृतकल्पित होना चाहिए। तभी हम प्रकृति के सर्वाधिक विकसित प्राणी के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेंगे।

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