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बिना विदाई हुये ही रुसवा होकर चले गये विश्वविद्यालय के तानाशाह कुलपति राजकुमार

  सत्य स्वरूप न्यूज नेटवर्क

   सैफई। कहते है कि इंसान को वक्त की नजाकत को भाँपते और समझते हुये अपना कार्य करना चाहिये क्योंकि वक्त कभी किसी का गुलाम नही होता कब किसकी सत्ता पलट दे,लेकिन शायद यह बात सैफई विश्वविद्यालय के राजा डॉक्टर राजकुमार भूल गये और अपनी तानाशाही और अकड़ से ऐसी नजाकत दिखाई कि विश्वविद्यालय से अपनी विदाई का फूलो का हार भी ना पहन सके।

   बाजार में बुके सजे की सजे रह गये लेकिन सैफई का कोई भी स्टॉफ बुके खरीदकर पहनाने की हिम्मत ना कर सका,सजे फूल तो मुरझाये ही लेकिन उससे ज्यादा दर्द शासन ने कुलपति की विदाई के वक्त से पहले विदाई कर डॉक्टर राजकुमार का चेहरा मुरझा कर दे दिया,किसी ने ऐसी उम्मीद ना लगाई होगी कि तानाशाह राजा अपनी विदाई से पहले इस हालत में रुसबा होकर अकेले विदा होकर चला जायेगा।शासन के पत्र आने से पहले ही राजा को भनक लगी और राजा अपने को कोरोना पॉजिटिव बताकर रुसबाई का तमगा लेकर लखनऊ चले गये,तीन साल से खुल जा सिम सिम जैसे आलीशान रिमोर्ट बाले दरवाजे के अफिस में बैठकर सत्ता चलाने वाले राजा यह भूल गये कि रिमोर्ट कंट्रोल के दरवाजे के बाहर प्रजा भी रहती है लेकिन प्रजा की अनदेखी कर राजा अपने कुछ चुनिंदा वजीर और सेनापति के सहारे माल इखट्टा करने में मशगूल रहे और रायबरेली जिले के अमावां दोस्तपुर में अपना करोड़ो रुपयो का 3 साल के अंदर शिक्षा का महल तैयार करवा लिया।

ऋषिकेश एम्स में भी इस्तीफा देकर निकले थे डॉक्टर राजकुमार

2012 में ऋषिकेश एम्स में निदेशक का पद संभालने वाले डॉक्टर राजकुमार वहाँ से भी अपना इस्तीफा देकर आये थे क्योंकि राजा की तानाशाही हर जगह जारी थी,माफियाओं और ठेकेदारों पर दबंगई से काम करवाने का आरोप लगाना ओर उनसे अपनी जान का खतरा बताकर डॉक्टर राजकुमार ऋषिकेश एम्स में भी वहाँ के स्टॉफ के निशाने पर रहे और उनके खिलाफ जमकर प्रदर्शन भी हुये,बाद में उनको इस्तीफा देकर आना पड़ा। आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री ने मिलने का वक्त नही दिया और मेरा डेढ़ लाइन का इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर लिया,

सैफई विश्वविद्यालय का करोड़ो का बजट फिर भी रोना

मुलायम के सपनो के महल रूपी विश्वविद्यालय में करोड़ो के बजट होने के नाते हर किसी की नजर कुलपति की कुर्सी पर रहती है और लोग कहते है "जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हो बसेरा,वह सैफई विश्वविद्यालय है मेरा"कुलपति डॉक्टर राजकुमार के राज्य में शासन से 2018-19 में 308 करोड़ रुपये जिसमे 75 करोड़ गैर मद वेतन के रूप में आया और अलग से 10 करोड़ रुपये सज्जा/ उपकरण/संयंत्र के रूप में कुलसचिव के नाम जारी होते है इसी तरह 2019-20 और 2020-2021 में भी 308 करोड़ जिसमे गैर मद वेतन के रूप में 75 करोड़ और 10 करोड़ रुपये अलग से उपकरण के लिए विश्वविद्यालय को प्राप्त हुये, हर कुलपति की निगाह गैर मद वेतन और सज्जा/उपकरण/संयंत्र खरीद पर लगी रहती है,इस बर्ष कोरोना काल को देखते हुए शासन ने 2021-22 में विश्वविद्यालय को 337 करोड़ रुपये जिसमे 80 करोड़ गैर मद वेतन के रूप में ओर उपकरण का बजट 10 करोड़ से बढ़ाकर 15 करोड़ कर दिया, पिछले तीन सालों में राजकुमार के राज्य को शासन से विश्वविद्यालय को 30 करोड़ रुपये सज्जा/उपकरण/संयत्र के शासन से प्राप्त हुये लेकिन उपकरणों की खरीददारी केवल लगभग 6 करोड़ की की गई इससे साफ जाहिर होता है कि कमीशन के खेल की सेटिंग कंपनियों से नही हो पाई जिससे गरीब मरीज इलाज के अभाव में मरता रहा और भटकता रहा।पिछले महीने अप्रैल माह में शासन ने विश्वविद्यालय को कोरोना के लिए 5 करोड़ 75 लाख रुपये रुपये दिये जिसमे पीपीई किट,टेस्टिंग किट और दवाओं के लिए जारी किये लेकिन सूत्र बताते है कि एक भी पैसा खर्च नही किया गया और मरीज मरते रहे।

पैसा सरकार को सरेंडर ना होकर बैंकों में फिक्स

पिछले तीन सालों का रखा उपकरणों का 24 करोड़ रुपया बैंकों में रखा है जबकि उस पैसे को सरकार को 31 मार्च के बाद प्रति बर्ष सरंडर करना होता है लेकिन राजकुमार राज्य में ऐसा नही हुआ अगर उपकरण की खरीदारी होती रहती तो शायद विश्वविद्यालय सोने की चिड़िया बना रहता और गरीब मरीज ना मरता,बल्कि बैंकों में जमा पैसो से मिलने वाला व्याज भी हजम होता रहा,प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा द्वारा कुलसचिव को लिखे पत्र 7/2018/156371-4-2018-एस-7/2018  के मुताबिक "स्वीकृत धनराशि को पीएलए/बैंक/डाकघर आदि में किसी भी दशा में नही रखी जायेगी "हर साल के बजट का बचा पैसा सरकार को सरेंडर करना चाहिए वर्ना वह अनियमितता की श्रेणी में माना जाता है लेकिन सैफई विश्वविद्यालय का पैसा कभी सरकार को सरेंडर नही होता यह थी राजकुमार की तानाशाही और कुलसचिव सुरेश चंद्र शर्मा की हीलाहवाली।

कुलपति ने रायबरेली के अमावां दोस्तपुर में खड़ा किया करोड़ो का संस्थान

विश्वविद्यालय में सबके सामने अपनो को ईमानदारी का चोला ओढ़कर दिखाने वाले कुलपति डॉक्टर राजकुमार ने 1 जून 2018 को चार्ज ग्रहण करने के 3 माह बाद 19 सितंबर 2018 में अपना खुद का कुमार मित्रा ट्रस्ट का नवीनीकरण करवाया और अपने संस्थान का तुरंत निर्माण कार्य शुरू करवा दिया जबकि ट्रस्ट का पंजीकरण 5 अप्रैल 2008 में हुआ था, सरकारी सेवा में रहकर कोई भी सरकारी व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के नाम से व्यक्तिगत ट्रस्ट नही बना सकता लेकिन डॉक्टर राजकुमार ने अपनी तानाशाही का नमूना हर जगह पेश किया।ट्रस्ट की शिकायत पीएमओ कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय में विचाराधीन है,पहले ट्रस्ट के निर्माण की देखरेख का जिम्मा बलरई के शंकर यादव को दिया गया बाद में कुछ महीने के बाद शंकर यादव ने कुलपति डॉक्टर राजकुमार को लाखों रुपयों का चूना लगाकर दगा दे दिया बाद में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी में ट्रस्ट निर्माण का जिम्मा लेते हुये अपने भाई को निर्माण कार्य की देखरेख में लगा दिया।

सेवानिवृत्त में बचे 5 साल फिर भी डॉक्टर राजकुमार खाली हाथ

डॉक्टर राजकुमार के सेवानिवृत्त में 5 साल बाकी है फिर भी अभी खाली हाथ है,कई विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेज में कुलपति/निदेशक के लिये आवेदन कर चुके है और सबमे निराशा हाथ लगी है,शासन से मिली रुसबाई के बाद अब डॉक्टर राजकुमार दलित कार्ड  खेल रहे है

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