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चुनाव में भेज सरकार ने दी संक्रमण की भेट,अब शिक्षक का वेतन काट कर मरहम लगाने की सलाह देता प्राथमिक शिक्षक संघ

चुनाव में भेज सरकार ने दी संक्रमण की भेट,अब शिक्षक का वेतन काट कर मरहम लगाने की सलाह देता प्राथमिक शिक्षक संघ

   विशेष संवाददाता

   उत्तर प्रदेश। कभी अपने हक की लड़ाई लड़ने में असमर्थ शिक्षकों का प्रतिनिधि करता शिक्षक संघ आज शिक्षक का नहीं सरकार का प्रतिनिधि हो गया है। वाकई प्राथमिक शिक्षक संघ अब शिक्षक हित में काम ना करके सरकार के हित में काम करने की पुरजोर कोशिश और चापलूसी के स्तर को सर्वोच्च दिखाने में पुरस्कृत होने की प्रथम श्रेणी में खड़ा है। अफसोस होता है कि कभी इतना बड़ा शिक्षक हितेषी संगठन जो बेसिक के सभी शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करता था आज इतनी ताकत भी नहीं रखता कि सरकार से करोना संक्रमित शिक्षकों के लिए मुआवजा मांग सके। 

  अपनी नेतागिरी दिखाने की, और सरकार की घुड़की से बचने का उन्होंने बहुत ही आसान तरीका चुना कि सभी शिक्षकों का एक दिन का वेतन काटकर शिक्षकों को मुआवजा दिया जाए। क्योंकि इससे ना सरकार का विरोध करना पड़ेगा और ना ही अपनी जेब से कुछ भी सहायता राशि किसी को देनी पड़ेगी।

  प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रांतीय पदाधिकारियों को अपने  बैठ जाना चाहिए क्योंकि संघर्ष की ताकत, हक की लड़ाई लड़ने की कवायद अब इनकी नहीं रही। आए दिन दिए जाने वाले बेतुके बयान देखकर ऐसा लगता है अब इन संगठनों को वाकई खत्म कर देना चाहिए , या युवा पीढ़ी को शिक्षकों के लिए बने हुए संगठनों की कमान दे देनी चाहिए।

  इतने सालों से प्रांतीय पदों पर काबिज शिक्षकों की बीमा राशि 87 रुपए से बढ़वा नहीं पाई। एलआईसी ने 2 साल पहले बीमा देने से मना भी कर दिया और यदि मना कर दिया है तो यह पैसा कहां जा रहा है यह भी पूछने की तथाकथित शिक्षक हितैषी ठेकेदारों की हिम्मत भी नहीं हुई।

किसी न किसी प्राइमरी व जूनियर स्कूल के शिक्षक होने के बावजूद खुद को किसी कैबिनेट मंत्री से नीचे ना समझने वाले इन प्रांतीय पदाधिकारी ..महानुभाव संगठन में लाखों का चंदा रखने वाले, यह नहीं सोचा कि क्यों ना शिक्षकों की मदद के लिए "पहल टीम" की तरह कोई सार्वजनिक टीम बना सके और अकस्मात शैक्षिक मदद शिक्षकों तक पहुंचा सके।

  इसके पहले भी तथाकथित कई संगठनों ने 1 दिन के शिक्षक का वेतन कटवा दिया डेढ़ साल से DA आपदा की भेंट चढ़ चुका है आगे  भी मिलेगी इसकी कोई गुंजाइश नहीं दिखती।  यह बात अलग है कि वोट की राजनीति में सरकार चुनाव से पहले कुछ घोषणा कर दे बाकी ना तो सरकार के पास बजट बचा है और ना ही इन  संगठनों के पास उसे वापस ले लेने की ताकत, क्योंकि इन्हें तो सरकार के हित में काम करना आता है शिक्षकों के नहीं।

 हास्यास्पद लगता है जब सरकार एस्मा लगाती है तब शिक्षक और कर्मचारियों के बने संगठन के पुरोधा हाय तौबा करते हैं कि क्यों लगा दिया जबकि शायद ही हम सब ने पिछले कई वर्षों से किसी हड़ताल को होते देखा हो।

   वाकई आज बेचारा शिक्षक अपनी असुरक्षा और अपने वेतन पर गड़ी हुई इन संगठनों के गिद्ध निगाहों से बहुत ही परेशान है। कोरोना महामारी में यदि किसी परिवार में यह संक्रमण पहुंच गया वहां कर्जा लेकर इलाज कराना पड़ा क्या किसी ने उन निजी शिक्षकों से पूछा कि आप अपने वेतन को देना चाह रहे हैं या नहीं।

   प्राथमिक शिक्षक संघ पहले खुद मनन करें कि उसके संगठन में कितने लोग जुड़े हुए हैं क्योंकि आज इतने संगठन है और सभी संगठनों के पास अपने शिक्षक हैं तो फिर यह किस आधार पर सभी शिक्षकों का ठेका लेकर उनका वेतन कटवाने की बात कह सकते हैं।

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