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स्वार्थी और मतलबी इंसान

प्रफुल्ल सिंह 

स्वार्थ अपना हित साधने की उग्र भावना है, स्वार्थ की भावना रखने वाला व्यक्ति भले ही किसी को धोखा देकर तत्काल में फायदा उठा ले मगर भविष्य कंटीला हो सकता है। निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य हमेशा प्रसन्नता लाता है जबकि स्वार्थ व्यक्ति को कमजोर बनाता है। जिसके अंदर स्वयं के लाभ की भावना नहीं होगी वह सभी का प्यारा होगा। सच्चे भाव से पूरी दुनिया आप की हो सकती है, लेकिन स्वार्थ के चलते आपकी दुनिया संकुचित भी हो जाती है। स्वार्थ सीमाओं से परे होता है स्वार्थ शब्द पर विचार करें तो स्व और अर्थ दो शब्दों से बना यह शब्द जीवन के उद्देश्यों को ही बदल देता है। स्व अर्थात अपने को अर्थ का तात्पर्य है हित कल्याण धन संपत्ति आदि से योजित कर लेना। स्वार्थ शब्द अपने आप में बुरा नहीं है परंतु दूसरे के हितों को हानि पहुंचा कर अपना हित सोचना सर्वथा अनुचित है स्वयं को जानने के लिए आवश्यक है कि मैं कौन हूं क्यों हूं। वह कौन है जो मुझ में है एक परमार्थहीन जीवन जीते भी मरने के समान है चाहे वह मन से हो, वाणी से हो या कर्म से हो पर हो ऐसे कि जैसे तुम्हें सदा जीना है और जियो ऐसे कि जैसे तुम्हें कल ही दुनिया से चले जाना है दूसरों की मदद किए बिना हम अपनी मदद नहीं कर सकते दूसरों को खुशहाली दिए बगैर हम खुशहाल नहीं रह सकते।

इंसान जब अपने लाभ और हित के लिए कार्य करता है तो वह उसका स्वार्थ कहलाता है। स्व अर्थ अर्थात अपना लाभ जो कि स्वार्थ कहलाता है। स्वार्थ को समाज में अनुचित समझा जाता है। किसी को स्वार्थी कहना उसके लिए अपशब्द के समान होता है। जो इंसान स्वार्थ के नशे में अपराधिक कार्यों को अंजाम देते हैं वह कितने भी घातक हो सकते हैं ऐसे इंसानों के लिए रिश्ते व भावनाओं की कोई कीमत नहीं होती है। बुद्धिमानी ऐसे इंसानों से दूरी बनाकर रखने और उनसे सतर्क रहने में है। रिश्तों में अपनापन समझ कर किसी के स्वार्थ को सहन करना वास्तव में मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं है क्योंकि लुटने व बर्बाद होने के पश्चात सावधानी दिखाने का कोई लाभ नहीं होता है। इंसान के मन में जब स्वार्थ की वृद्धि होने लगे यदि उसी समय मन को शांत किया जाए तो सहजता से शांत किया जा सकता है अन्यथा इंसान का स्वार्थ पोषित होकर जीवन को विनाश के मार्ग पर ले जाता है एवं इंसान को परिणाम भुगतने के समय जब अहसास होता है तब तक बहुत देर हो जाती है। जीवन में यह समझना आवश्यक है कि स्वार्थ द्वारा भौतिक सुख तो जुटाए जा सकते हैं कितु सम्मान उस स्वार्थी व्यक्ति का धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है उसका सामाजिक पतन निश्चित होता है यदि सम्मान चाहिए तो स्वार्थ से दूर रहना आवश्यक है वरना यह आपका पतन कर देगा।

वास्तव में देखा जाए तो स्वार्थी व्यक्ति से बड़ा खतरनाक कोई हो नहीं सकता, कई बार ईमानदार व्यक्ति इनके चंगुल में फंसकर बहुत बड़ा नुकसान कर बैठता है, इसी के चलते विद्वानों की सलाह है कि स्वार्थी व्यक्ति से हमेशा दूरी बनाकर रखनी चाहिए, क्योंकि स्वार्थ के चक्कर में फंसकर वह अपना तो भविष्य चौपट ही रहा साथ ही आपके साथ इतना बड़ा धोखा कर सकता है कि जीवनभर पछताना पड़े। पुराने पंजाब के एक छोटे से गांव की घटना के माध्यम से बताना है कि वहां रामदास नाम के एक भगवत भक्त दर्जी रहते थे, जो आसपास के जमींदार परिवारों के कपड़े सिल कर अपनी आजीविका चलाते थे। वह हमेशा भगवान नाम स्मरण और भगवान की लीला में ही तल्लीन रहते थे। कपड़े सिलते समय भी उनका सुमिरन सतत चलता रहता। सब घटनाओं में वह परमात्मा कृपा का अनुभव करते थे। उनसे सभी लोग बड़े प्रसन्न थे और उन्हें भगतजी कहकर पुकारते थे। रामदास जी का एक पड़ोसी था जो उनसे ईष्र्या एवं द्वेष करता था इनका शांति और आनंद से रहना उससे सहन नहीं होता था। वह हमेशा इनको परेशान और दुखी करने के लिए कुछ न कुछ करता रहता, पर सफल नहीं हो पाता। अपने स्वार्थ वश उसने कई बार नुकसान की सोचा, लेकिन जब वह बीमार हुआ तो भगत ने ही उसकी देखरेख की। इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि अपने कर्म निस्वार्थ भाव से करों भले सामने वाला दुष्ट हो।

स्वार्थ शब्द पर विचार करें तो स्व और दो शब्दों से बना हुआ यह शब्द ऐसे प्रतीत होता है स्व अपने को कहते है इसके अर्थ के तो अनेक अर्थ हो सकते हैं इसमें धन-संपत्ति व प्रायोजन की सिद्धि भी मानी जा सकती है। स्वार्थ शब्द अपने आप में बुरा तो नहीं है परंतु स्वार्थी मनुष्य अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए अनेक बार दूसरों के हित की हानि पहुंचा कर अपना हित अनुचित साधनों एवं अधर्म पूर्वक व्यक्ति काम करता है और स्वार्थ के नाम पर बुरा कार्य करने वाला यदि ज्ञानी है तो वह अपनी बुद्धि से ज्ञान का दुरुपयोग करता है। यदि ऐसा व्यक्ति ज्ञानी धार्मिक होता है तो धर्म को भी हानि पहुंचाता है आज स्वार्थ बुद्धि इतनी अधिक बढ़ गई है कि अपने सामान्य स्वार्थ के लिए भी व्यक्ति अन्य जीवो के प्राण तक ले लेता है जैसे सांप ने यदि नहीं भी काटा होता है तब भी यह विषैला प्राणी मानकर कदाचित काटना ले इस भय से उसे मार दिया जाता है अत: आज तुलसीदास जी की रामचरितमानस की एक पंक्ति सत्य सिद्ध हो रही है कि स्वार्थ लागि करें सब प्रीती सुर नर मुनि की यह रीती आज के समय हर व्यक्ति अपने स्वार्थ के ही एक दूसरे से जुड़ा है एक विद्वान का कथन है यह संसार ही स्वार्थ का अखाड़ा ह।ै स्वार्थी इंसान भ्रष्ट होकर समाज के लिए अंधा होता है आने वाली पीढ़ी को इस से कैसे बचाया जाए जो आज समाज हित में एक चिता का विषय बनता जा रहा है। 

आज का मनुष्य समझदार कम है और स्वार्थी अधिक क्योंकि स्वार्थ इंसान को मतलबी बना देता है स्वार्थी मनुष्य सिर्फ अपने बारे में यही सोचता है कि किस तरह से खुद का फायदा होगा इस सोच में वह डूबा रहता है। अगर आप उसे समझने के बाद भी उसका साथ नहीं छोड़ते तो यह जान लीजिए कि आपका नुकसान होकर ही रहेगा। समय रहते इनसे सचेत होकर किनारा कर लेना ही उचित काम है। प्रतियोगी व व्यस्त जिदगी में स्वार्थी बहुत मिलेंगे और झूठा साथ निभाकर समय पर आपको नीचे गिरा देंगे। ऐसे लोगों का साथ करने से आपको भी अपयश मिलेगा। बड़े बुजुर्गाें के अनुभव को भी हमें मानना चाहिए जिससे वह आपको सही और गलत व्यक्ति की पहचान बता सके। दोस्ती उनसे रखिए जो निजी हित का ध्यान न रख सर्वस्व आप पर न्यौछावर करें।

पहले गांव में हमेशा एक दूसरे की मदद को लोग तैयार रहते थे, कभी कोई स्वार्थ न था। आज आधुनिकता व प्रतिस्पर्धी समाज ने हमें स्वार्थी बना दिया। अब हमारी आंखों पर ऐसी पट्टी बंध गई कि हमें अपने हित के आगे कुछ समझ ही नहीं आता है। भले किसी दूसरे को कितना नुकसान हो जाए या उसे हानि पहुंचे, लेकिन हम केवल और केवल खुद से मतलब रखते है, लेकिन यह भी ध्यान कर लेना चाहिए कि ऐसे लोगों का साथ आखिर में कोई नहीं देता है और एक समय पर वह अकेले हो जाते हैं। आप दूसरों को गिराकर खुद तो जल्दी ऊपर पहुंच जाएंगे लेकिन उससे दोगुनी रफ्तार से नीचे आकर गिरेंगे। उस समय कोई भी सुख दुख पूछने वाला नहीं होगा। स्वार्थ से तभी दूर रह सकते हैं जब आपके अंदर अपनत्व का भाव हो और आपके संस्कार आपको ऐसा करने से रोके।


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