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तुम्हारी आहट - उससे पहले के बाद में, तुम याद हो मेरी याद में

तुम्हारी आहट - उससे पहले के बाद में, तुम याद हो मेरी याद में

    श्रृंगार और वियोग के घोल में सना फागुन का महीना, हृदय को शालती हुई यादें और अतीत को झकोरती अल्हड़ हवाएं, उस दौर को गुजरे एक अरसा हुआ, कितना कुछ बीत गया वक़्त के इन दो किनारों के बीच लेकिन बस तुम हो कि मुझमें बीत नहीं रही। 


राधा के समर्पण से पहले, 

रूक्मिनी के तर्पण के बाद। 

भागीरथी को भीगने से पहले, 

सरस्वती को सूखने के बाद। 

लिपि को लिखने से पहले, 

भाषा को भूलने के बाद। 

चंदा को डूबने से पहले, 

सविता को उगने के बाद। 

उषा को जगने से पहले, 

निशा को सोने के बाद। 

रजनी को जाने से पहले, 

किरण को आने के बाद। 

नैना को झपकने से पहले, 

नीरा को टपकने के बाद। 

चंचला को चलने से पहले, 

वसुधा को घूमने के बाद।

कविता को कहने से पहले, 

श्रोता को सुनने के बाद। 

ज्योति को जलने से पहले, 

रोशनी को बुझने के बाद। 

आस्था को आने से पहले, 

श्रद्धा को जाने के बाद। 

सुमन को खिलने से पहले, 

संध्या से मिलने के बाद। 

वसंती को रूकने से पहले, 

नीलम को चलने के बाद। 

वर्षा को गिरने से पहले, 

सरिता को बहने के बाद। 

दृष्टि को मिलने से पहले, 

सृष्टि को हिलने के बाद। 

करूणा को आने से पहले, 

कीर्ति के जाने के बाद। 

प्रतीक्षा को रूकने से पहले, 

प्रतिज्ञा को टूटने के बाद।  

तुलसी की सुगंध से पहले, 

मेंहदी के मधुरंग के बाद। 

लाजवंती के छुवन से पहले, 

नागफनी के चुभन के बाद।  

जननी के जन्म से पहले, 

अमिता के अंत के बाद। 

वही हम हैं वही तुम हो, 

सही हम हैं सही तुम हो। 

प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"

युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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