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आओ फागुन के चार दिन मन की होली खेलें

आओ फागुन के चार दिन मन की होली खेलें

यह सम्पूर्ण जीवन ही नानाविध रंगों से पूर्ण है। सर्वत्र रंगों की नैसर्गिक विभिन्नताएँ विद्यमान हैं। सनातन स्वयं में एक पर्व है। होली अर्थात सब में एक, एक में सब। यह संस्कृति इतनीं सहज और पूर्ण है कि इसे भूतिसृज् की संज्ञा दी गई। यह संस्कृति भूत्यर्थम् हुई। यह संस्कृति जिस ग्रह पर पुष्पित हुई, पल्लवित हुई, मात्र वही तक ठहर जाना इसका इष्ट न था, अपितु इस संस्कृति ने अस्तित्व के विभिन्न आयामों को स्पर्श किया। इस संस्कृति ने बतलाया कि इस अस्तित्व में मात्र हम ही नही हैं, अपितु अनन्त जीवन अणुओं की गतिशीलता से ही यह चलायमान है। सहज लक्षण के परे, जो अप्रकट है, उसमें भी जीवन के सौन्दर्य को बूझ लेना इस संस्कृति की विशेषता रही है। अतएव हम सर्वप्रथम भूतभव शब्द से परिचित होते हैं। वह जो सबके भीतर विद्यमान है। और इस सम्पूर्ण विद्यमानता को चलाने के लिए जिस अक्षुण्ण एकत्व की आवश्यकता है, उसका भी प्रतिपादन इसी संस्कृति ने सर्वप्रथम किया। अतएव हमारे यहाँ भूतभृत् शब्द भी है। होली मध्य है। इस उत्सव में जाता वर्ष और आने वाला वर्ष दोनो सम्मिलित होते हैं। अतएव होलिका दहन के दिन हम संवत जलाकर विदा कर आते हैं। और उस विदाई का स्वागत हम नवीनता भरे रंगों से करते हैं।

फाल्गुन तो वृहस्पति का एक वर्ष है। जिसका उदय फाल्गुनी नक्षत्र में होता है। गुरु वृहस्पति का वर्ष। परम्परा का शिखर। ब्रह्माण्ड का एकीकरण। लोक का भाग। जीवन की चर्या। होली लोक को रँगती है। शतियों से यह हवाओं को जगा रही है। दिशाओं की अरूप स्थिरता को गतिमान कर रही है। यह जो अबीज-निर्वाक-निर्वात सर्वत्र पसर रहा है, यह उसको भी मदन सम्मोह से भर देती है। यह लोक में गुलाल बनकर उड़ती है। परम्परा से अबीर बनकर लिपटती है। जीवन से रङ्ग बनकर खेलती है। कृष्ण को बरसाने में नचाती है। राम के अवध में अवधि से मिलती है। शिव में भस्मीभूत हो जाती है। 

किसी यौवना के गाल पर उपटकर लाज-लाल हो जाती है।किसी प्रेमिका पर प्रीत-छींट बनकर छिटक जाती है। यह छींट उसके हृदय की ही कोई अमिट छाप बन जाती है।


मीरा तो सील संतोष की केसर घोलती हैं। प्रेम प्रीत की पिचकार है। मीरा तो ऐसी डूबी रँगलाली हैं कि अम्बर भी लाल हो जाता है। कृष्ण ही उनके फागुन हैं। यह लोक तो मृत्यु से भी रंग खेलता है। यह तो विराट के इस सतत निरयवर्त्मन को रंगनाथ का दान है। होली तो होने का नाम है। वसन्त मिलाता है। फाग उसे रचता है। जीवन उसे अपनाता है। समय उसे लोक पर चढ़ा देता है। सहस्राब्दियाँ इसे अपने व्यवहार में ढालती हैं। और राग बसन्त जनमता है। यह उत्सव आकाशगंगा की रातों में, नखतों के मध्य होते परिवर्तनों पर वर्ण का वर्षण है। यह जगत उस विराट का आयोजन है। रंग तो वस्तुतः प्रकाश की जादूगरी भर हैं। रङ्ग तो वह स्थल है जहाँ अभिनय होता है, नृत्य होता है। इस संस्कृति ने सबकुछ अभिनय ही माना है। किन्तु यह अभिनय भी जहाँ जमे वह रंग। जब सात रंग मिलकर एक हो जाँय तो वह सफेद होता है। अतएव हम जब उस एकत्व को प्राप्त होते हैं तो शुद्ध व शुभ्र हो जाते हैं। और जब इन सातों में से कोई एक रङ्ग भी न रहे तो वह काला होता है। इसीलिए मृत्यु का रंग काला है। हम वही देख पाते हैं जो कि परावर्तित होता है। हमे इस रङ्ग के जगत में स्वयम को मिला देना है। फाल्गुन जाते जाते स्वयम को हमे सौंप जाता है। हम उसे अनन्त काल से गले लगाते आ रहे हैं।

और अन्त में :-

हम सभी फागुन के इस चार दिन में मन की होली खेल लें, इसी शुभेच्छा के साथ आनन्दित रहिये रंगोत्सव में रंग जाइये..

प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"

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