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महफिल ए मसर्रत में  झूम के बरसे अक़ीदत ओं के फूल

महफिल ए मसर्रत में झूम के बरसे अक़ीदत ओं के फूल

 ब्यूरो सगीर अमान उल्लाह

बाराबंकी। महफिल ए मसर्रत में झूम के बरसे अक़ीदत ओं के फूल दरे ज़हरा पे आके सभी ने अपने मुक़द्दर जगाए पर कुछ ऐसे बदनसीब थे जो यहाँ आके भी फ़ायदा न पाए। बाबे ज़हरा जलाने वालों को  माफी नहीं।

 यह बात करबला सिविल लाइन में बीबी ज़हरा की विलादत के मौके पर महफिल ए मसर्रत को खिताब करते हुए मौलाना गुलज़ार जाफरी ने कही ।मौलाना ने ये भी कहा कि जहां तारीफ़ व ज़र की भूख नहीं होती वहीं शायरी कामयाब होती है । दरे फातिमा बाबे रहमत है । महफिल ए मसर्रत में डा रज़ा मौरान्वी ने अपने बेहतरीन अन्दाज़ में अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा- तभी तो हुक्मे खुदा हुआ है कोई नबी से न तेज बोले, यह किस सहाबी की गुफ्तगू ने बढ़ा दिया इजतराबे  रहमत।सारिब  मौरान्वी ने अपना बेहतरीन कलाम  पेश करते हुये पढ़ा - तुम्हारी आमद की आहटों ने लगाए खुशियों के शामियाने , हमारी किस्मत के हाथ आई मसर्रतों  की तनाबे रहमत । अजमल किन्तूरी ने अपना बेहतरीन कलाम पेश करते हुए पढ़ा लिखा हुआ है बराए ज़हरा सरे वरक़ इन्तेसाबे रहमत  ,इसी लिए ज़ेहनों दिल की ज़ीनत बनी हुई है किताबे रहमत डा मुहिब रिज़वी की शायरी की परवाज़ बलंद नज़र आई उन्होंने अपना बेहतरीन कलाम पेश करते हुए पढ़ा हमारी तख ईल की ज़बाँ के सुखन को लुकनत का डर नहीं है करिश्मा साज़ी के आसमां पर मिला है हमको लुआब ए रहमत ।आरिज़ जर्गान्वीं ने अपना कलाम पेश करते हुए  पढ़ा- छिपी थी नूरे खुदा में अब तक महक थी उसकी गुलाबे रहमत , मिली है ऐसी खुशी नबी को नही है कोई जवाबे रहमत ।मेहदी बाराबंकवी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा -फज़ा में बादे सहर भी अपना क़दम ठहर के बढ़ा  रही है,ज़मीं पे चादर महक की अपनी बिछा रहा है गुलाबे रहमत । हाजी सरवर अली कर्बलाई ने अपना बेहतरीन कलाम पेश करते हुए पढ़ा- फलक से उतरा जमीं पे आया खुदा के घर से निसाबे रहमत ,नबी की बेटी जहां में आई कुछ और चमका शबाब ए रहमत ।मुज़फ्फ़र इमाम ने बेहतरीन कलाम पेश करते हुए पढ़ा- नजर से बुग्ज़ो हसद हटाकर जो देखे मुफ्ती किताबे रहमत, बरस रहा है इन्हीं के घर पर फजीलतों का शहाबे रहमत।कलीम आज़र ने  पढ़ा - नबी के सीने पर है जो उतरी उसे है कहते किताबे रहमत , पढ़े जो कोई भी इसका सूरा उसे भी होगा सवाबे रहमत ।बाक़र नक़वी ने पढ़ा  - सलाम करता है जिसकी ड्योढ़ी पे  आके खुद आफताबे रहमत,  कसम खुदा की उसी के दम से खुला हुआ है यह बाबे रहमत।कशिश सन्डीलवी का कलाम कलीम रिज़वी ने,अज़मल किन्तूरी का कलाम  अली गंगोल्वी ने,मौलाना रज़ा का कलाम मीसम रज़ा ने , हुमा ख्वाहर का बेहतरीन कलाम ज़ईम काजमी ने  पेश किया।इसके अलावा ज़मानत अब्बास और दिलकश रिज़वी ने भी बेहतरीन  कलाम पेश किया।अज़हर ज़ैद्परी,आसिम नक़वी ,हैदर आब्दी अयान काज़्मी,अली,आसिफ अख्तर व रज़ा मेहदी ने भी नज़रानए अक़ीदत पेश किया आगाज़ तिलावते कलाम ए इलाही से मौलाना इब्ने अब्बास ने किया ।निज़ामत बाक़र नक़वी ने की ।बादे महफ़िल  मुल्क के अम्नो अमान की दुआएं की।

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