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खबर छपने के बाद जागी बार्डर की एस.एस.बी., लाखो के कॉस्मेटिक सामान व चारपहिया वाहन सहित पकड़े गए दो तस्कर

खबर छपने के बाद जागी बार्डर की एस.एस.बी., लाखो के कॉस्मेटिक सामान व चारपहिया वाहन सहित पकड़े गए दो तस्कर

दिल्ली-मुंबई जैसे अन्य राज्यों से आकर बॉर्डर पर करते हैं तस्करी

ब्यूरो चीफ़ अंकुल गिरी

पलियाकलां-खीरी। हाल ही में छपी खबर का हुआ बड़ा असर बताया जाता है कि गौरीफंटा बॉर्डर पर लाखों की कॉस्मेटिक के सामान सहित एक चौपाया वाहन सहित दो तस्करों को एसएसबी ने गिरफ्तार किया है पूछताछ में बताया कि दिल्ली से आकर गौरीफंटा के धोखे बाजार से प्रतिबंधित सामानों को भारतीय राज्यों में बेचने का धंधा करते है और भी खुलासे करते हुए बताया कि बॉर्डर पर प्राइवेट वाहनों से गैरकानूनी कामों को अंजाम देने में बहोत आसानी रहती है। अब आपको बता दें कि इन दिनों तमाम राज्यों के तस्करों की नजर गौरीफंटा व सूंडा के बॉर्डर पर बनी हुई है इसी को देखते हुए एसएसबी को मुखबिर की सूचना पर यह कार्रवाई हाथ लगी। 

इंडो-नेपाल की खुली सीमा तस्करों को खूब भा रही है। सुरक्षा एजेंसियां व पुलिस सीमा पर कितनी भी सख्ती क्यों न कर दें, लेकिन अपने मजबूर नेटवर्क व सेटिंग-गेटिंग के बदौलत तस्कर अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं। इन दिनों कास्मेटिंग सामान की तस्करी काफी मुनाफे का काम मान तस्कर इससे भारतीय बाजार को पाटने में लगे हैं और तमाम ब्रांडों की कंपनियां आंखों पर पट्टी बांधकर बैठी हुई है। बता दें कि इनमें शैम्पू, टूथ पेस्ट से लेकर क्रीम, साबुन, लिपिस्टिक व अन्य कास्मेटिंग सामान शामिल है। इसका खुलासा तब हुआ जब मीडिया की टीम ने जांच पड़ताल की तो पता चला नेपाल के चोरी छुपे रास्तों से भारी तादाद में नेपाली ब्रांडेड सामानों को भारतीय बाजारों में लाकर खुलेआम तस्कर बेच रहे हैं यही नहीं कुछ व्यापारी नेपाली रेट से सामानों को खरीद कर भारतीय मूल्य रुपए के हिसाब से प्रतिबंधित सामानों को भारतीय बाजारों में डंप करते हैं और भारतीय रुपयों के हिसाब से प्रिंट रेट में बेच रहे हैं। वही विभिन्न एरिया में होलसेलर तस्करी के इन सामान को खरीदकर गांव-देहात के ग्राहकों में खपा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, इन सामान में कुछ कास्मेटिक प्रॉडक्ट नकली भी हैं। जिन पर मेड इन चाइना व नेपाल लिखा होता है। वहीं, अधिकांश सामान असली और ब्रांडेड हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक व्यापारी ने बताया कि नेपाल के 48 रुपए के टूथपेस्ट के लिए भारतीय रुपए में 30 रुपए देना होता है। व्यापारी भारतीय रुपए के अनुसार, 30 रुपए देकर माल उठा लेते हैं और  बाजारों में 48 रुपए में बेच देते हैं। चूंकि सामान पर एमआरपी 48 रुपए लिखा होता है तो उपभोक्ता भी पूछताछ नहीं करते।

नेपाली सामान की पहचान करना बेहद मुश्किल है। यह सामान देखने में बिल्कुल उसी तरह है, जैसा इंडिया में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी पैकिंग के पीछे काफी ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि यह प्रॉडक्ट मेड इन नेपाल का है। हालांकि हिंदुस्तान लीवर से लेकर डाबर जैसी तमाम ऐसी ब्रांडेड कंपनियां हैं, जिन्होंने नेपाल में अपनी फैक्ट्री डाल रखी है। जिस पर मेन्यूफैक्चरिंग से लेकर कंपनी का पता भी नेपाल का है और यह प्रॉडक्ट सिर्फ नेपाल में ही बेचे जा सकते हैं। लेकिन तस्कर इसका फायदा उठाते हुए भारतीय बाजारों में लाकर बेच रहे हैं। चूंकि नेपाल में इसकी एमआरपी बेहद कम है और भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत और भी कम है।

जानकारों के मुताबिक, तस्करी के इस कारोबार से शहर के कई सफेदपोश भी जुड़े हैं। इन्होंने इस काम के लिए सैकड़ों कैरियर को लगा रखा है। यह कैरियर भारत-नेपाल की खुली 182 किलोमीटर की सीमा का फायदा उठाते हुए पकडंडियों के रास्ते को चुनते हैं। रास्ते में होती है सेटिंग हालांकि इन सामान को बार्डर एरिया से लाते वक्त भी आसानी से पकड़ा जा सकता है। बार्डर पर एसएसबी और कस्टम की आंखों में धूल झोंकर आने वाले इन सामान की भारत की सीमा में पड़ने वाले थाना क्षेत्रों में कोई चेकिंग नहीं होती है। सभी पुलिस पिकेट और पोस्ट पर ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों को 100 की नोट देकर गाडि़यां बड़े आराम से पास हो जाती हैं।

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