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फिर किसानों को नुक्सान उठाना पड़ सकता है

फिर किसानों को नुक्सान उठाना पड़ सकता है

     दिलीप कुमार 

लखनऊ। मीडिया इस पर बहस नहीं करता कि सरकार किसान विरोधी कानून क्यों?  मीडिया इस पर भी बात नहीं करता कि सरकार किसानों के संसाधन छीनकर कृषि बाजार को पूंजीपतियों का गुलाम क्यों बनाना चाहती है? मीडिया प्रोपेगैंडा पर बहस करता है कि किसानों को कोई ‘भड़का’ रहा है।

क्या मीडिया ने ईमानदारी से ये बताने की कोशिश की कि किसान संगठनों के विरोध के कारण जायज हैं? जनता की तरफ से दूसरी आवाज विपक्ष की हो सकती थी, अगर वह चाहता तो।

नए कानून से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका सीधा नुकसान किसानों को ही होगा।

इन तीनों कृषि कानूनों के आने से ये डर बढ़ गया है कि ये कानून किसानों को बंधुआ मजदूरी में धकेलने का काम होगा।

ये विधेयक मंडी सिस्टम खत्म करने वाले, न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने वाले और कॉरपोरेट ठेका खेती को बढ़ावा देने वाले हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो सकता है।

बाजार समितियां किसी इलाक़े या छेत्र तक सीमित नहीं रहेंगी। दूसरी जगहों के लोग आकर मंडी में अपना माल डाल देंगे और स्थानीय किसान को उनकी निर्धारित रकम नहीं मिल पाएगी। नये विधेयक से मंडी समितियों का निजीकरण होगा।

नया विधेयक ठेके पर खेती की बात कहता है। जो कंपनी या व्यक्ति ठेके पर कृषि उत्पाद लेगा, उसे प्राकृतिक आपदा या कृषि में हुआ नुक़सान से कोई लेना देना नहीं होगा। इसका नुकसान सिर्फ किसान ही उठाएगा।

अब तक किसानों पर खाद्य सामग्री जमा करके रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी। ये पाबंदी सिर्फ़ व्यावसायिक कंपनियों पर ही थी। अब शन्सोधन  के बाद जमाख़ोरी रोकने की कोई व्यवस्था नहीं रह जाए।

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