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नाम के बहाने : क्या निशाना कहीं ओर था

नाम के बहाने : क्या निशाना कहीं ओर था

    अस्सी के दशक में मनमोहन देसाई की अमिताभ बच्चन अभिनीत एक फिल्म आई थी-नसीब। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त हिट साबित हुई थी। इसमें इसके एक गीत ‘जॉन, जॉनी, जनार्दन तारा रम पम-3‘ का भी बड़ा योगदान था। बाद में इसी ‘जॉन-जॉनी-जनार्दन‘ नाम से साउथ के सुपर स्टार रजनीकांत की भी हिन्दी फिल्म आयी थी। खैर नाम भले ही तीन हो वह एक ही व्यक्ति विशेष की ओर इंगित करते हैं। वो हैं-अमिताभ बच्चन और रजनीकांत। मैं बात कर रहा हूँ राजनीति की। हमारा देश दुनिया का इकलौता देश है जो भारत, हिंदुस्तान और इंडिया नाम से जाना जाता है। इसी तरह भारत का एकमात्र शहर वाराणसी भी है, जिसके तीन नाम हैं-वाराणसी, बनारस और काशी लेकिन यह अपवाद है और इस अपवाद के चलते आए दिन विवाद भी होते रहते हैं। अब तो इसके नाम पर भी विवाद हो रहा है कि हम भारत कहेंगे, हिंदुस्तान नहीं कहेंगे लेकिन इससे फायदा क्या है? नाम के बहाने देश को बांटने और मुस्लिम समाज की सहानुभूति बटोरने की यह कोशिश देश में नफरत के कितने विष घोलेगी? चिंतन तो इस मुद्दे पर भी होना चाहिए। जो आवश्यक भी हैं। 

         हाल ही में बिहार विधानसभा के नवनिर्वाचित 190 विधायकों ने दो पालियों में हिन्दी, मैथिली, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं में शपथ ली लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के विधायक अख्तरुल ईमान ने शपथ तो उर्दू भाषा में ली लेकिन प्रारूप में वर्णित हिंदुस्तान की जगह भारत कहा। हिंदुस्तान बोलने पर अपनी आपत्ति जाहिर की। उनका कहना था कि संविधान में कहा गया है कि हम भारत के लोग... यहां भारत की जगह उर्दू में हिंदुस्तान लिखा हुआ है। हम भारत के लोग शब्द को उन्होंने कितना आत्मार्पित किया, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन, उन्होंने शपथ लेते वक्त हिंदुस्तान की जगह भारत कहा। इससे मजहबी कट्टरता का भी बोध होता है। भाषा को सम्मान देने के लिहाज से ही कई भाषाओं में शपथ लेने की व्यवस्था दी गई है। कोई किसी भी भाषा में शपथ ले सकता है लेकिन शर्त यह है कि वह शपथ-पत्र के प्रारूप में अपनी ओर से कोई छेड़छाड़ नहीं करेगा। देखा जाता है कि शपथ लेते वक्त विधायक या सांसद बहुधा उच्चारण की गलतियॉ कर जाते हैं जिन्हें प्रोटेम स्पीकर, राष्ट्रपति या राज्यपाल के स्तर पर टोक कर सही कराया जाता है अन्यथा शपथ ग्रहण पूरा नहीं माना जा सकता। हालांकि प्रोटेम स्पीकर जीतनराम मांझी ने उन्हें भारत कहने की इजाज़त भी दे दी। यहॉ उनकी सूझबूझ की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपने पद का मान रख किसी भी तरह का कोई विवाद उत्पन्न न हो इसलिए ऐसा किया होगा। उनका ऐसा करना वाजिब भी था। क्योंकि यदि वे अड़ जाते तो बात बहुत ही दूर तलक जाती। साथ ही संविधान के प्रति आस्था को लेकर विवादों का दौर राजनीतिक गलियारों में फेल जाता। इसलिए जो भी हुआ अच्छा ही हुआ और सही समय पर सही निर्णय भी। उनकी जगह कोई भी समझदार व्यक्ति होता तो शायद यही करता। लेकिन भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के विधायकों को अख्तरुल ईमान का यही रवैया रास नहीं आया। उनका मानना है कि हिंदुस्तान बोलने में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

दूसरी तरफ एआईएमआईएम के विधायक अख्तरुल ईमान को कांग्रेस के विधायक शकील अहमद खान से सीखना चाहिए। उन्होंने संस्कृत में शपथ ली और सबका दिल जीत लिया वरन् प्रशंसा भी पा गए। मगर अख्तरुल ईमान उर्दू में शपथ लेकर भी भारत और हिंदुस्तान की चकरघिन्नी में फंस गए। उन्हें सोचना चाहिए कि मैथिली में जिन 15 विधायकों ने शपथ ली, उन्होंने तो किसी शब्द पर आपत्ति नहीं की। उर्दू में शपथ लेने वाले 7 में से 6 विधायकों को भी हिंदुस्तान शब्द से आपत्ति नहीं थी। संस्कृत में 5 और अंग्रेजी में चार और हिन्दी में 159 विधायकों ने शपथ ली, सबने शपथ पत्र के प्रारूप के अनुरूप शपथ ली। माना कि उन्होंने हिंदुस्तान की जगह भारत पढ़ भी लिया तो इससे कौन-सा नया चमत्कार हो गया। असदुद्दीन ओवैसी यूं तो बात-बात में संविधान पढ़ने की नसीहतें देते रहते लेकिन जो प्रारूप 1952 से ही चला आ रहा है, उसकी उनके विधायक के स्तर पर उपेक्षा को आखिर क्या कहा जाएगा? इससे तो यह साफ जाहिर होता हैं कि वे किसी तरह के विवाद को जन्म देना चाह रहें होंगे। सवाल यह उठता हैं कि नाम के बहाने उनका निशाना कहीं ओर था। परंतु दाद देनी होगी कि प्रोटेम स्पीकर जीतनराम मांझी ने जिस तरह से इस विवाद को ब्रेक लगाया। अन्यथा यह विवाद बढ़ता तो बात कहीं के कहीं निकल जाती। सच, बिहार कर्तव्यपरायणता में आगे हैं और रहेंगे। तभी तो कहते हैं बिहार कभी हार नहीं मानता। इस पर अर्ज किया हैं।

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