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हरदोई के युवा विचारक योगेन्द्र सिंह ने एन जी ओ पर उठाए सवाल

हरदोई के युवा विचारक योगेन्द्र सिंह ने एन जी ओ पर उठाए सवाल


सत्य स्वरूप संवाददाता


बावन (हरदोई)।  देश मे तमाम तरह के एन जी ओ चल रहे हैं,जो कि विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। अक्सर इन संस्थाओं में गलत तरीके से फंडिंग और फंडिंग के पैसे का गलत इस्तेमाल सहित तमाम तरह के भ्र्ष्टाचार की खबरे आती रहती हैं।हरदोई के युवा ने एन जी ओ की उपादेयता पर सवाल उठाए हैं।
राजनीति शास्त्र में परास्नातक योगेन्द्र सिंह विधि और शिक्षा में भी स्नातक हैं। और समय समय पर इस तरह के मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचार रखते रहते हैं।श्री सिंह ने बताया कि NGO(non-governmental organization) एक गैर सरकारी संगठन होता है,जो कि बिना लाभ के काम करता है। अधिकतर राजनीतिक,सामाजिक और पर्यवारण के बचाव के लिए काम करते हैं। एक NGO स्थानीय,राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय हो सकता है।
NGO के बारे में उपरोक्त जानकारी कमोबेश सभी को है,किंतु मेरा विषय अलग है।
आज मैं किसी NGO की उपादेयता के विषय मे कुछ प्रश्नों के साथ चर्चा करना चाहता हूं।
आप जानते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहाँ संसदीय कार्य प्रणाली है, तथा ये प्रणाली भारतीय संविधान में निहित है। इसी संविधान में जहाँ सभी नागरिकों के लिए कुछ मूल अधिकार हैं। इन्ही मूल अधिकारों की प्राप्ति के इर्द गिर्द ही ये सारे NGO संचालित हैं। यहाँ यह भी बताना समीचीन होगा कि भारतीय संविधान में राज्य के कुछ नीति निर्देशक तत्व है। इसको ऐसे समझते हैं,की राज्य को किस प्रकार की नीति बनाना है यह इन्ही तत्वों पर आधारित है। 
इसी प्रावधान में लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी निहित है। इसका अर्थ है कि राज्य जो भी कानून बनाये उसके पीछे जनता का कल्याण अर्थात हित होना चाहिए। 
अब प्रश्न यह उठता है कि अगर कोई व्यवस्था (सरकार)जनता के कल्याण और उनके अधिकारों के लिए ही काम करती है,सारे कानून भी इसी लिए बने है। फिर इस स्थिति में मानव के मूल अधिकारों की रक्षा, पर्यवारण की रक्षा, महिलाओं, बुजुर्गों ,बच्चों,प्राणियों और जंगलों की सुरक्षा के लिए NGO को काम करने की जरूरत क्यों पड़ रही है,और सरकार इन NGO का लगातार पंजीकरण क्यों करती जा रही है?? 
इसको ऐसे भी समझिए कि जैसे कोई NGO मानवाधिकार के लिए काम कर रहा है,तो क्या सरकार ये स्वीकार करती है कि सिस्टम में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है??
कुछ NGO गरीबो को रोटी बंटाते हैं,तो क्या इसका अर्थ ये है कि सरकार का PDS सिस्टम फेल हो चुका है ,सरकार गरीबों को राशन नही उपलब्ध करा पा रही है?
      महिलाओं,बाल अधिकारों की सुरक्षा क्या सरकारी  सिस्टम से नही हो पा रही है?
      अब मेरा प्रश्न ये है कि अगर सरकार ये सब करने में सक्षम है तो फिर NGO को क्यों चलने दे रही है??


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